अब ख़त भी नहीं आते

अब ख़त भी नहीं आते

 

अब ख़त भी नहीं आते सदा भी नहीं आती

क्या याद मेरी उनको जरा भी नहीं आती

 

बीमार-ए-मोहबत को कज़ा भी नहीं आती

कुछ काम फकीरों कि दुआ भी नहीं आती

 

शीशे कि तरह तोड़ ही देते है दिलो को

ये कैसे सितमगर है दया भी नहीं आती

very san gajal on bajrang.in

क्यों होते हो बेचेन मेरे दिल को दुखा के

क्या तुमको मानाने कि अदा भी नहीं आती

 

अब ख़त भी नहीं आते सदा भी नहीं आती

क्या याद मेरी उनको जरा भी नहीं आती

 

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Bajrang

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