भारत में विषमतामूलक समाज का जन्म

भारत में विषमतामूलक समाज

उदारीकरण की आंधी ने किस कदर भारत में विषमतामूलक समाज को जन्म दिया है, इसे समझने के लिए हाल ही में आई दो रिपोर्टों पर गौर किया जाना चाहिए। वॉलेट मॉनीटर की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के शहरी निवासियों का रुझान जहां शिक्षा और सुख-साधन बढ़ाने वाली चीजों पर अपना खर्च बढ़ाने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है, वहीं अंतरराष्ट्रीय संस्था सेव द चिल्ड्रेन की 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में माताओं की हालत बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका से भी बदतर है।

उदारीकरण पर जोर देते 24 साल बीत चुके हैं। मौजूदा विकास की अवधारणा के केंद्र में चूंकि शहर हैं, लिहाजा शहरी मध्यवर्ग की क्रय क्षमता लगातार बढ़ी है। उदारीकरण ने शहरीकरण की तरफ दुनिया को धकेलने की कोशिश की है। विकास का पैमाना भी शहरीकरण ही हो गया है। भारत में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत हाल ही में एक सौ शहरों को मंजूरी दी गई है। माना जा रहा है कि इसके जरिये विकास की गति तेज होगी। विनिर्माण उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन अब तक विनिर्माण उद्योग का विकास तो यही बताता है कि शहरी विकास में भागीदारी वाले मजदूरों के जरिये शहरी विकास के साथ ही झुग्गियों का एक अंधेरा कोना भी विकसित हो जाता है।

संयुक्त राष्ट्र ने महानगर नाम से एक रिपोर्ट ही प्रकाशित की है। इसके मुताबिक, मौजूदा विकास की अवधारणा में शहरों को भले ही केंद्रित कर दिया हो, लेकिन वे गांवों की तुलना में ज्यादा ऊर्जा खाते हैं, ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं और हर शहर अपने साथ झुग्गियों का एक अलग शहर विकसित कर देता है, जहां जरूरी जीवनीय सहूलियतें तक नहीं होतीं। शायद यही वजह है कि अब भी भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में मातृ और शिशु मृत्यु दर अधिक है।

 

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Bajrang

One Comment

  • Digger said:
    July 23, 2018 at 5:52 pm

    It’s about time soemnoe wrote about this.

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