बिखराववाद ” आधुनिकता की विसंगता”

हमरे देश मैं बहुत से विर्धा-आश्रम खुल रहे है जो कि हमारी संस्कृति से बिल्कुल ही अलग है| भारत में अनाथालय  का जिक्र हमारे शास्त्रो में  मिलता है पर विर्धा-आश्रम का जिक्र तो हमारे शास्त्रों  में  नहीं मिलता | फिर ऐसा क्यों होता जा रहा है| इस को गंभीरता से सोचने कि जरुरत है | जब इसके बारे मैं खोजा तो पता लगा कि हमारे देश में 19वी सताब्दी में आया| हमारे समाज की बहुत ही  संगठित और व्यवस्थित संरचाना थी यहाँ पर परिवार एक साथ ही रहता था जिसमे बुजर्गो के साथ बच्चे भी  साथ में रहते थे | बुजर्गो, बच्चों के बड़े होने के बाद व्यापारिक जिम्मेदारी आपने बच्चों को सोंप देते थे| उनका दिन अब बच्चों और अपने उम्र के लोगो तथा परिवार को मार्गदर्शन देने के का काम में लग जाता था| वो आपने सामाजिक कर्तव्य और सम्मान के साथ अपनी बैठक पर बेठे रहते थे जहा उनका कार्य सामाजिक तारो को जोड़ना था जो कि समय के साथ टूट जाते है| हमारे बुजर्ग एक कड़ी का काम भी करते थे जहा बच्चों से से कोई विवाद हो जाता था तो उन्हें आपनी समझ और अनभुव से ठीक भी कर देते थे| जब पुराने समय में देखते है तो पता चलता है कि हमारे हिंदुस्तान के सामाजिक ताना-बाना इस तरह से बना था कि सभी आपसे में जुड़े हुए थे |

तब लोगो के घरेलु चिकत्सक भी थे | उनके बीमारी में घर पर ही सेवा उपलब्ध हो जाती थी | उस समय  चिकत्सक  चिक्त्सक के साथ परिवारक सलाकार भी होते थे| इस तरह लोगो को पारिवारिक मदद के साथ-साथ चिकत्सक सुविधाए मिल जाती थी  और आदमी स्वस्थ भी जल्दी हो जाते थे| पुराने समय में घरो में ही माताएं-बहनों का प्रसव होता था गाँव कि पारिवारिक चिकत्सक कि महिलाये ही सब कराती थी| इतना संगठित सामाजिक ताना बाना होते हुए भी, ये बिखराव देखने को मिलता है तो निश्चित ही सोचने कि जरुरत है आखिर ये बिखराव कैसे आया | ये मुमकिन नहीं कि ये दो- चार साल में तो नहीं आई है इसकी उत्पति परमाणु विखंडन पदति की तरह बिखरता नज़र आता है मुग़ल साशन तक कोई भी बिखराव देखने को नहीं मिला| ये बिखराव अंग्रेजी सस्सान काल के प्रारंभ तक भी नहीं था| पर अंग्रेजो के पलायन के समय से ये देखने को मिलने लगा|old age home"www.bajrang.in

आज के युवा जीवन में हस्तक्षेप पसंद नहीं करते हैं, फिर वे अपने माता-पिता ही क्यों न हो| आज के युवा को अपने करियर को लेकर बहुत ज्यादा असुरक्षा का सामना करना पड़ता है, बदलती परिस्थितियों में कोई विदेशों में बसना चाहता है तो कोई अपने ही देश के , महानगरों में भविष्य तलाशता है. इस चक्कर में वो एक जगह टिक नहीं पाते हैं और ऐसे में माता-पिता की जिम्मेदारी उन्हें बोझ लगने लगती है. शहरों में आबादी का केंद्रीकरण और गलाकाट प्रतियोगिता भी अपने बुजुर्गों से दुराव का एक बड़ा कारण है. ऐसे में, वे इस बोझ से छुटकारा पाना चाहते हैं और वृद्धाश्रम के रूप में उन्हें समस्या का ‘विकलांग समाधान’ मिल जाता है. बिचारे बुजुर्ग अपना सारा जीवन और जीवन की सारी कमाई अपने बच्चों पर लुटाने के बाद खाली हाथ और बेबस हो कर आश्रम में रहने को मजबूर हो जाते हैं और फिर जीवन के बाकी दिन अपने परिवार से दूर रह कर तड़पते सिसकते बिताते हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसे कृत्य समाज के संपन्न-वर्ग द्वारा ज्यादा देखने को मिल रहे हैं, तथाकथित आधुनिकता और बड़ी सोसायटी के नाम पर! इन्हीं लोगों द्वारा आजकल ये बात आम तौर पर सुनने को मिल जाती है कि हमारे समाज में पश्चिमी सभ्यता का असर हो गया है और वृद्धाश्रम भी उसी विकृति का एक हिस्सा है. लेकिन ऐसे लोग एक बात भूल जाते हैं कि पश्चिमी देशों की तुलना में हमारी संस्कृति और सभ्यता बिलकुल अलग है| पश्चिम में बच्चे बालिग होने के साथ ही स्वतंत्र हो जाते हैं और अपनी जिम्मेदारी खुद उठाते हैं| वो माँ बाप को घर से नहीं निकालते, बल्कि माँ-बाप का घर खुद ही छोड़ देते हैं| इसके उलट हमारे यहाँ हमारी सभी जरूरतों को चाहे वो  अपनी पढ़ाई को पूरी करने तथा कमाई शुरू करने  और उसके बाद तक का ध्यान अभिभावकों द्वारा रखा जाता है| यहाँ बच्चों को पालने – पोसने की एक परंपरा और संस्कृति है| इसके लिए माता-पिता अपने जीवन में कोई कसर नहीं छोड़ते और अपने भविष्य की चिंता किये बिना अपनी सारी कमाई अपने बच्चों पर खर्च कर देते हैं| और तो और उनकी अचल सम्पति पर भी बच्चे स्वतः ही अपना अधिकार समझने लगते हैं|

मैंने बहुत सी किताबे भी पड़ी है और इतिहासकार धर्मपाल जी को सुनाने से पता लगा की ये सब कुछ बडे पश्चात् सामाजिक चिन्तक  और समाजवादी व्यवस्था का हिसा है जो किसी भी देश को आपने आधीन बनाये रखने के लिए बनाई गयी थी| जब आदमी संगठित होता है तो तोड़ना इतना आसन नहीं होता है और ये ही निति तो अंग्रेजो कि थी जिसके ततः उन्होंने भारत पर आपना सम्राज्य स्थापित किया था| पर ये भारत का दुर्भाग्य ही है कि अंग्रेजो के जाने के बाद भी उनके बनाये नियम और कानून हमारे देश में चल रह है| और जो भी इनको बदलने कि कोशिस करता है वो किसी न किसी आकाल मीर्तु  का शिकार होता है

समस्या का हाल: हम को आपने आप को व्यवस्थित करना होगा| हमें बच्चो को एक वयव्सयिक के गुण को सिखाना होगा| उनको सामाजिक जीवन के मूल्यों और उनकी जरुरत और फायदे को समझाना पड़ेगा|

आपने आप को थोडा सा खुली सूच का रखना पड़ेगा| उनको समझाने के नए और सटीक रास्ते तलाश करने होंगे|

 

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